•अल्लाह पाक सभी लोगो को तालीम की दौलत से नवाजे
इस्लाम धर्म में एक तरफ शिक्षा ग्रहण करने के लिए चीन भी जाने के लिए कहा गया है जबकि दूसरी तरफ औरतों को तालीम के लिए घर के बाहर भेजने से रोका जाता है?
- देखिए, इस्लाम धर्म में तालीम औरत और मर्द दोनों के लिए जरूरी है। तालीम इंसान को आदमियत से इंसानियत की तरफ ले जाता है। इसलिए प्रगति के इस दौर में शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। तालीम की ही देन है कि जंगल जैसे अरब की सरजमीं, जहां पर हर प्रकार की बुराइयां फैली हुई थी, अल्लाह ने मुसलमानों के आखरी पैगम्बर हजरत मोहम्मद स.अ. को उस जमीं पर उतारा और तालीम के जरिए वहां वहशीपन का खातमा हुआ।
• शहरों की अपेक्षा गांव में तो महिलाओं की तालीम का और भी बुरा हाल है?
पिछले दो-तीन दशकों में गांव में शिक्षा के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है लेकिन यह बात सच है कि गाँव में अभी भी दूर-दूर तक स्कूल या शिक्षा की व्यवस्था अच्छी न होने से लड़कियाँ उच्च शिक्षा से वंचित रह जाती हैं। फिर भी सैकड़ों स्कूल और कॉलेज ऐसे हैं जहां उपस्थिति आवश्यक नहीं है। सरकार ने इसीलिए डिस्टेंस एजूकेशन यानी दूरस्थ शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत की है जिसके माध्यम से पुरूष व महिलाएं घर बैठे ही सेल्फ स्टडी करके आला तालीम हासिल कर सकती हैं। महात्मा गांधी का सपना था कि गाँव-गाँव स्कूल खुलेगा, बगैर पढ़े कोई न रहेगा। गांधी जी का यह सपना अब सच साबित होने लगा है।
• सरकारी नौकरियों और व्यवसाय में मुसलमानों की संख्या नगन्य है?
सबकी जड़ शिक्षा ही है। उच्च शिक्षा के अभाव में मुसलमान आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। पैसे के अभाव में वे पढ़ाई पूरी नहीं कर पाते हैं जिसके कारण उन्हें सरकारी नौकरियां नहीं मिल पाती हैं। उसी पैसे के अभाव में वे बड़े व्यवसाय शुरू करने में असमर्थ हो जाते हैं। यह सब एक ऐसा चक्र है जो एक दूसरे से जुड़ा हुआ है। इससे उबरने के लिए उच्च शिक्षा बेहद जरूरी है।
• सर सैयद अहमद खाँ ने शिक्षा का जो सपना देखा था
सर सैयद अहमद खाँ, शिबली नोमानी, आदि जैसे कई शिक्षाविदों को इस बात का अंदेशा था कि आने वाले दिनों में मुसलमान शिक्षा में पिछड़ सकते हैं। इसे ध्यान में रखते हुए उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना की थी और दीनी तालीम के साथ-साथ अंग्रेजी तालीम हासिल करने पर जोर दिया था। डॉ. रफीक जकरिया ने एक बार मुंबई के एक सेमिनार में यह कहा था कि तालीम के मामले में देश के हरिजन मुसलमानों से भी बेहतर हैं। उस समय हरिजन की शिक्षा का प्रतिशत 4 था जबकि मुसलमानों का प्रतिशत मात्र 2 प्रतिशत था। लेकिन कुछ लोगों ने इस प्रकार के चारों का गलत मतलब निकाला और उन्हें भला बुरा तक कह दिया। लेकिन लोगों को अब पता लगता है कि उन्होंने काफी दूर की सोचकर ही शिक्षा व्यवस्था पर जोर दिया था।
• आधुनिक युग में मदरसा की तालीम कितना उचित है?
प्रतियागिता के इस दौर में यदि मुसलमानों को समाज के अन्य लोगों के साथ अपनी प्रगति करनी है तो उन्हें मदरसा की तालीम के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी की तालीम भी ग्रहण करना जरूरी है। मदरसा में भी अरबी, फारसी, उर्दू की तालीम के साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षणों जैसे कंप्यूटर प्रशिक्षण, इंजीनियिरंग, मेडिकल, सीए, वकालत, आदि जैसे अन्य प्रकार के प्रोफेशनल शिक्षा की तालीम लेना भी जरूरी है। सिर्फ दीनी तालीम के भरोसे रहना आज के दौर में वेबकूफी है।
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